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Saturday, February 21, 2009

आदत



"पुनीत सहलोत की कविता"


कोशिश थी हवाओं की

हमें पत्तों की तरह उडाने की,

साजिश थी ज़माने की

हमें हर वक्त आजमाने की,

साथ किसी का मिल न सका कभी,

पर आदत हमारी थी हर बार जीत जाने की.

यकीन था ख़ुद पर,

कुछ कर गुजरने की ठानी थी,

दीवानगी जो थी मंजिल को पाने की,

उसे जूनून अपना बनाने की

आदत हमारी थी.

राह जो चुनी थी हमने अपनी,

हर मोड़ पर मिली मुश्किलों की सौगात थी,

हर छोर पर गुलशन खिला दिए हमने,

कांटो से भी यारी की,

आदत हमारी थी.

ढल चुका था सूरज,

अब चाँद से मुलाक़ात की बारी थी,

ख्वाब जो देखे थे इन बंद आंखों ने,

हकीक़त उन्हें बनाने की,

आदत हमारी थी.