Sunday, July 25, 2010

महिलाओं ने बदली पानघाट की तस्वीर

घूंघट में रहने वाली महिलाओं ने देवास जिले के कन्नौद ब्लाक के गाँव ‘पानपाट’ की तस्वीर ही बदल दी है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया है कि – कमजोर व अबला समझी जाने वाली महिलाएं यदि ठान लें तो कुछ भी कर सकती हैं। उन्हीं के अथक परिश्रम का परिणाम है कि आज पानपाट का मनोवैज्ञानिक, आर्थिक व सामाजिक स्वरुप ही बदल गया है। जो अन्य गाँवो के लिए प्रेरणादायक साबित हो रहा है।

पानपाट गाँव का 35 वर्षीय युवक ऊदल कभी अपने गांव के पानी संकट को भुला नहीं पाएगा। पानी की कमी के चलते गांव वाले दो-दो, तीन-तीन किमी दूर से बैलगाड़ियों पर ड्रम बांध कर लाते हैं। एक दिन ड्रम उतारते समय पानी से भरा लोहे का (200 लीटर वाला) ड्रम उसके पैर पर गिर गया और उसका दाहिना पैर काटना पड़ा। ऊदल अपाहिज हो गया। हर साल गर्मियों में गांव का पानी संकट उसके जख्म हरे कर जाता। मध्यप्रदेश के अन्य कई गांवों की तरह यह गांव भी आजादी के पहले से ही पानी का संकट साल दर साल भोगने को अभिशप्त है। यहां सरकारी भाषा में कहें तो डार्क जोन (यानी जलस्तर बहुत नीचे) है, हर साल गर्मियों में परिवहन से यहां पानी भेजा जाता है। ताकि यहां के लोग और मवेशी जिन्दा रह सकें। औरतें दो-दो तीन-तीन किमी दूर से सिर पर घड़े उठाकर लाती है। जिन घरों में बैलगाड़ियां हैं, वहाँ एक जोड़ी बैल हर साल गर्मियों में ड्रम खींच-खींचकर ‘डोबा’ (बिना काम का, थका हुआ बैल) हो जाते है। सरकारें आती रहीं, जाती रहीं। नेता और अफसर भी पानी की जगह आश्वासन पिलाकर चले जाते पर समस्या जस की तस बनी रही।

इस समस्या का सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता था औरतों को। आखिर वे ही तो परिवार की रीढ़ हैं। आखिर एक दिन वे खुद उठीं और बदलने चल दीं अपने गांव की किस्मत को गांव के तमाम मर्दों ने उनकी हंसी उड़ाई ‘आखर जो काम सरकार इत्ता साल में नी करी सकी उके ई घाघरा पल्टन करने चली है’ पर साल भर से भी कम समय में ही वे लोग दांतो तले उंगली दबा रहें हैं। इस कथित घाघरा पल्टन ने ही उनके गांव की दशा और दिशा बदल दी है। यह कोई कपोल कल्पित कहानी या अतिशयोक्ति नहीं है, बल्कि हकीकत है। देवास जिले के कन्नौद ब्लॉक के गांव पानपाट की।

इन औरतों के बीच काम करने पहुंची स्वंयसेवी संस्था ‘विभावरी’ ने उनमें वो आत्मविश्वास और संकल्प शक्ति पैदा की कि सदियों से पर्दानशीन मानी जाने वाली ये बंजारा औरतें दहलीजों से निकलकर गेती-फावड़ा उठाकर तालाब खोदने में जुट गईं। दो महीनें मे ही तैयार हो गया इनका तालाब। जैसे-जैसे तालाब का आकार बढ़ता गया इनका उत्साह और हौंसला बढ़ता गया। उन्हें खुशी है कि अब इस गांव में पानी के लिए कोई अपाहिज नहीं होगा और कोई बहन-बेटी पानी के लिए भटकेगी नहीं। सत्तर वर्षीय दादी रेशमीबाई खुद आगे बढ़ीं और फिर तो देखते ही देखते पूरे गांव की औरतें पानी की बात पर एकजुट हो गईं। उन्होंने पानी रोकने की तकनीकें सीखी, समझी और गुनी। पठारी क्षेत्र और नीचे काली चट्टान होने से पानी रोकना या भूजल स्तर बढ़ाना इतना आसान नहीं था। पर ‘पर जहां चाह-वहा राह’ की तर्ज पर विभावरी को राजीव गांधी जलग्रहण मिशन से सहायता मिली।

बात पड़ोसी गांव तक भी पहुंची और वहां की औरतें भी उत्साहित हो उठीं- इस बीमारी की जड़सली (दवाई) पाने के लिए। यहां से शुरुआत हुई पानी आंदोलन की। अनपढ़ और गंवई समझी जाने वाली इन औरतों ने पड़ोसी गांवों की औरतों का दर्द भी समझा। गांव का पानी गांव में ही रोकने के गुर सीखाने निकलीं ये औरतें। बैसाख की तेज गर्मी, चरख धूप और शरीर से चूते पसीने की फिक्र से दूर। नाम दिया जलयात्रा। 20 से 25 मई 2001 तक यह जलयात्रा भाटबड़ली, झिरन्या, टिपरास, नरायणपुरा, निमनपुर, गोला, बांई, जगवाड़, फतहुर जैसे गांवो से गुजरी उद्देश्य यही था कि-जो मंत्र उन्होंने अपनाया वह दूसरे गांव के लोग भी करें।

जलयात्रा के बाद तो इस क्षेत्र में पानी आंदोलन एक सशक्त जन आन्दोलन की तरह उभरा अब तो मर्दों ने भी कंधे से कंधा मिलाकर चलना तय कर लिया। आज क्षेत्र में सेकड़ों जल संरचनाएं दिखाई देती हैं। इससे भविष्य में यह क्षेत्र पानी की जद्दोजहद से दो-चार नहीं होगा। पानी को लेकर शुरु हुआ यह आंदोलन अब पानी से आगे बढ़कर क्षेत्र की समाजार्थिक स्थिति में बदलाव जैसे मुद्दों को भी छू रहा है क्षेत्र में सफाई, स्वास्थ्य, कुरीतियों से निपटने, शिक्षा, पंचायती संस्थाओं में भागीदारी, छोटी बचत व स्वरोजगार से अपनी व पारिवारिक आमदनी बढ़ाने जैसे मुद्दे भी इन औरतों के एजेंडो में शामिल हैं।

पिछले एक साल में यहां इन्होंने तालाब, निजी खेतों में तलईयां, गेबियन स्ट्रक्चर, मैशनरी चेकडेम, लूज बोल्डर श्रृंखलाबद्ध चेकडेम व मेड़बंदी जैसी कई संरचनाएं बनाई हैं। पर इससे महत्वपूर्ण देखने वाली बात यह कि – यहां के समाज में इन सबसे एक विशेष प्रकार का विश्वास और जागरुकता आई। अब ये लोग अपने अधिकारों को लेने के लिए लड़ना सीख गए हैं। ये अब नेताओं और अफसरों के सामने घिघियाते नहीं हैं, बल्कि नजर उठाकर नम्रता के साथ बात करते हैं।

नारायणपुरा में 5वीं कक्षा पास शारदा बाई गांव की ही ड्राप ऑउट 12 बालिकाओं को पढ़ा रही है। इन गांवो में सफाई पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। निस्तारी पानी के लिए 56 सोख्ता गडढ़े व लगभग दो दर्जन घूड़ों में नाडेप तरीके से खाद बनाई जा रही है। क्षेत्र के युवकों को रोजगारमूलक गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है तथा किशोरों, औरतों के लिए लायब्रेरी बनाई गई है। क्षेत्र में लगातार स्वास्थ्य फॉलोअप शिविर लग रहे हैं। इन गांवो के लगभग ढ़ाई सौ साल के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि खुद यहां कि औरतों ने यहां की तस्वीर बदल दी है। इन गांवो में मनोवैज्ञानिक, सामाजिक व आर्थिक बदलाव को आसानी से देखा, समझा जा सकता है। ‘विभावरी’ के सुनील चतूर्वेदी इस पूरे आंदोलन से खासे उत्साहित हैं। वे कहते हैं “एक अनजान धरती पर नकारात्मक माहौल में काम करना आसान नहीं था। व्यवस्था के प्रति पुराना अविश्वास और नेताओं के आश्वासन ने यहां के ग्रामीणों को निराश कर दिया था। पर क्षेत्र की महिलाओं ने हमारे काम को आगे बढ़ाया”। क्षेत्र की औरतों के बीच जुनूनी आत्मविश्वास जगाने वाली विभावरी की एक दुबली-पतली लड़की को देख कर सहसा विश्वास नहीं होता कि यह वह लड़की है जिसने इन औरतों की जिन्दगी के मायने बदल दिये। सोनल कहती हैं। “गांव में तालाब निर्माण काकाम ही सामाजिक समरूपता का माध्यम बना। मैंने इसमें कुछ भी नहीं किया मैंने तो सिर्फ उन्हें अपनी ताकत का अहसास कराया।

झिरन्या के बाबूलाल कहते हैं हम तो इन्हें भी रुपया खाने वाले सरकारी आदमी समझते थे पर इन्होंने तो हमारी सात पुश्तें (पीढ़ियां) तारने जैसे काम कर दिया। काली बाई बताती हैं कि अब उनके काम को सामाजिक मान्यता मिल गई है। देवास, इन्दौर भोपाल तक के लोग उनके काम को देखने व बात करने आ रहे हैं। इससे बड़ी खुशी की बात हमारे लिए क्या हो सकती है

Sunday, January 31, 2010

कहानी लदुना के पानी की

एक कहानी जिसे भेजा हैं सचिन कुमार जैन ने भोपाल से.


पूरे देश-प्रदेश की भांति मंदसौर जिले ने भी पानी के गंभीर संकट को भोगा है, परन्तु इस ऐतिहासिक जिले के समाज ने जल संघर्ष की प्रक्रिया में नये-नये मुकाम हासिल करके अपनी विशेषता को सिद्ध कर दिया है। सूखे – अकाल के दौर में मंदसौर में दो सौ से ज्यादा जल संरक्षण की संरचनाओं का जनभागीदारी से निर्माण किया गया। जबकि एक हजार से ज्यादा जल स्रोतों का जीर्णोद्धार हुआ। करोड़ो रुपये का श्रमदान भी हुआ और पानी की कमी ने पानी की अद्भुद कहानी रची है। मूलतः इस गाँव की जलापूर्ति का सबसे बड़ा साधन पास का ही लदुना तालाब रही है। परन्तु यहां जल संकट ने उस वक्त भीषण रूप अख्तियार कर लिया जब यह तालाब पूरी तरह सूखने लगा।

आखिरकार वर्ष के आठ माह इस तालाब के सूखे रहने से गांव में जीवन का संकट उत्पन्न हो गया। क्योंकि जल सम्बन्धी जरूरतों को पूरा करने का यही एक मात्र साधन था। तब पंचायत के मंच से कूओं के निर्माण के लिये निर्णय लिये गये। सबसे पहले गांव से ही सार्वजनिक भूमि पर ऐसे निर्माण के लिये प्रस्ताव आये। ताकि पेयजल आपूर्ति में आसानी हो सके और ग्रामिणों को ज्यादा दूर न जाना पड़े। इसके बाद यहां कुओं की खुदाई के निजी और पंचायती प्रयास शुरू हुए। परन्तु यह एक आश्चर्यजनक तथ्य ही है कि लदुना में 60 से 100 फीट तक खुदाई करने के बाद भी पांच कुओं में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं हो पायी। तब ग्राम सभा में यह तय किया गया कि वर्ष में अब ज्यादातर समय सूखे रहने वाले तालाब की जमीन पर ही खुदाई करके देखा जाये, शायद जलधारा फूट पड़े। फिर पूरे अनुष्ठानों के साथ पानी की खोज में धरती की गोद की गहराई नापने के प्रयास शुरू हो गये। परन्तु दुर्भाग्यवश इन प्रयासों के भी सार्थक परिणाम नहीं निकले और अस्सी फीट गहराई तक खुदाई करने के बाद प्रयास निरर्थक ही रहे। तब पंचायत के साथ ग्रामीणों ने मिलकर सूखे तालाब के बीचों-बीच एक दांव के रूप में आखिरी प्रयास करने का निश्चय किया और अगले ही दिन काम शुरू हो गया। अब एक ओर हैरत अंगेज घटना का वक्त आ गया था क्योंकि मात्र 27 फीट की गहराई पर ही पानी की भारी उपलब्धता के संकेत मिल गये और अस्तित्व में आई भवाबां की कुईयां।

निश्चित ही इस बार लोगों ने भूमिगत जलधारा को पा लिया था। इसके बाद 37 फीट गहराई तक पहुंचते ही पानी की झिरें तो ऐसे फूट पड़ी मानों वे किसी बंधन से मुक्त हो गई हैं। वास्तव में यह लदुना और पानी की ऐसी मुलाकात थी मानों दोनों कई सालों तक एक-दूसरे से रूठे रहे सम्बन्धी हों उनके हृदय में मिलने की तमन्ना परिपक्व होती रही हो।

यह गांव इस कुईयां के निर्माण की घटना को किसी श्राप से मुक्ति का समारोह मानता है। लदुना कुंएं के सम्बन्ध में ऐसे कई वाकये हैं जिनसे प्रकृति के अचंभित कर देने वाले स्वरूप और चरित्र का प्रमाण मिलता है। यह एकमात्र जल स्रोत आज पांच हजार से ज्यादा की जनसंख्या वाले गांव का पानी की जरूरतों को अकेले पूरा कर रहा है।

वास्तव में सूर्योदय और सूर्यास्त के समय यहां आदर्श जल चौपाल का नजारा देखने को मिलता और उस जल संघर्ष की ध्वनि तरंग को महसूस ही किया जा सकता है जब गांव के लोग क्रमबद्ध तरीके से समूह में आकर लगभग 30 फीट व्यास वाले कुंए की 41 घिर्रियों के साथ पानी खींचते हैं। निश्चित ही यह कुईयां अपने रूप, संरचना और सामुदायिक उपयोगिता के सन्दर्भ में विश्व का सबसे अनूठा उदाहरण माना जा सकता है। इस कुंईया ने गांव के सारे सामाजिक भेदभाव को भुला दिया है।

लदुना की सरपंच भंवर कुंवर सिसौदिया कहती हैं कि इस बात के कोई मायने नहीं हैं कि कौन किस जाति का है। वे मानती हैं कि मुझे गांव के लोगों ने अपना प्रतिनिधि चुना, और जाति, धर्म या और किसी भी आधार पर भेदभाव करने का मुझे कोई अधिकार नहीं है। हम चाहते थे कि गांव की सूखे की समस्या हल भी हो और पंचायत को हम आदर्श रूप दे सकें। इसी सोच के मद्देनजर लदुना की संकरी गलियों में फर्शीकरण किया गया। ताकि (कुंईया) से पानी के टैंकर लाकर गांव में ही पानी उपलब्ध कराया जा सके। इस पंचायत में यह दावा भी झूठा साबित हुआ है कि पंचायत की महिला प्रतिनिधियों के अधिकारों का उपयोग उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य करते हैं। लदुना पंचायत की महिला सरपंच और पंचों के पति तो इस कार्यकाल में उनके कार्यालय तक ही नहीं गये, बहरहाल उनका सहयोग सदैव मिलता रहा है और मुद्दे की बात तो यह है कि गांव को जीवनदान देने वाले कुंये के निर्माण का निर्णय लेने में महिला पंचायत प्रतिनिधियों की ही सबसे अहम भूमिका रही है।

अब यह ग्रामीण समाज पानी की उपेक्षा नहीं करना चाहता है और जल व्यवस्था बेहतर बने, इसके लिये फिलहाल तीन सूत्रीय सामुदायिक कार्यक्रम यहां लागू हैं :- एक : पानी सुनियोजित और आवश्यकता आधारित उपयोग हमारी जिम्मेदारी है।
दो : कुंओं के आसपास 20 फीट के दायरे में मुरम की परत बिछाई गई। ताकि पानी का जमीन में रिसाव हो सके और गंदगी भी न हो।
तीन : कुंओं, बावड़ियों का रखरखाव हमारी अपनी जिम्मेदारी है। वर्ष के छह महीने इसी जलस्रोत से पूरे गांव की जल आपूर्ति होती है, और अचरज उस वक्त होता है जबकि हर रोज पांच हजार लोगों की जरूरतों को पूरा करके यह कुंइया दो से तीन घंटे में फिर लबालब भर जाता है। जबकि शेष छह माह यह तालाब में पानी होने के कारण लगभग 13 फीट पानी में डूबी रहती है। इसकी मेढ़ पर ग्रामीणों ने एक स्तम्भ भी बनाया है, जो तालाब के जल स्तर की जानकारी देता है। संयोगों की श्रृंखला का अगला बिन्दु यह है कि जब यह तालाब सूख जाता है, तब गांव के किसान इसकी अतिउत्पादक और बेहतरीन कृषि योग्य मिट्टी का उपयोग अपने खेतों को उपजाऊ बनाने में करते हैं। शिक्षक नारायण हरगौड़ मानते हैं कि रासायनिक उर्वरकों के कारण अनुपजाऊ होते खेतों को इस प्राकृतिक चक्र से पुर्नजीवन मिला है। लदुना देशज संस्कृति और पारम्परिक सद्भाव की अब भी एक मिसाल बना हुआ है। कभी सीतामऊ का केन्द्र रहे इस गांव में आज भी बेहतरीन हवेलियां और छोटे महल हैं, जो स्वयं शताब्दियों पहले की जल संरक्षण तकनीकों की कथा बयां करते हैं। लदुना और आस-पास के क्षेत्रों में 30 ऐसी बावड़ियां हैं। जिनका निर्माण दो सौ से ज्यादा वर्ष पूर्व हुआ था परन्तु अब उन्हें खोजना पड़ता है।

प्राचीन ग्रामीण समाज पानी के सन्दर्भ में बहुत व्यावहारिक और ठोस तकनीकी सोच रखता था। वह पानी के प्रति पूरी तरह से संवेदनशील था। उनके लिए यह उपभोग या व्यवसाय की वस्तु नहीं था बल्कि समाज के जीवन और मानवीय श्रद्धा का मूल आधार था। यही कारण है कि वह ऐसे जल स्रोतों का निर्माण करता था जिनसे न केवल वर्तमान की जरूरतें पूरी हों बल्कि भविष्य के समाज को भी प्यासा न रहना पड़े। उस समाज ने जमीन की ज्यादा गहराई में जाकर भूमिगत जलधाराओं का शोषण करने, उन्हें सुखाने का प्रयास नहीं किया। वह भूजल को चिरकालीन बनाये रखना चाहता था क्योंकि उसका विश्वास था कि – समय पर होने वाली पानी की कमी से निपटने में यह भूमिगत जलस्रोत ही मददगार साबित होंगे और मिट्टी की नमी से किसान अल्पवर्षा में भी फसल ले सकेंगे।

लदुना में बनी सास-बहू की बावड़ी भी उसी मानवीय सामाजिक सोच को प्रतिबिम्बित करती हैं। जिसमें यह विश्वास किया जाता था कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में यथा संभव ऐसे कार्य करने चाहिए जिनसे दूसरों को सुख मिले और उनके कष्टों को कम किया जा सके। इसीलिए हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुरूप ऐसे निर्माण कार्यों की पहल करता था जिससे किसी न किसी को विश्राम और शांति का सुख मिल सके। सास-बहू की बावड़ी का निर्माण भी अब से तीन सौ वर्ष पूर्व एक ग्रामीण महिला द्वारा

इसी विश्वास के आधार पर कराया गया था कि लदुना से गुजरने वाले राहगीरों की थकान को कम किया जा सकेगा और उनकी प्यास बुझाई जा सकेगी। सास-बहु की बावड़ी अपने आप में अद्भूत कला का नमूना भी है। इसमें पानी की सतह तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक ढंग से सीढ़ियां बनाई गई हैं। जबकि विश्राम करने के लिये भी स्थान निर्धारित किया गया है। ये तमाम निर्माण कार्य किसी बाहरी सहायता या अनुदान से नहीं बल्कि स्वेच्छा से निजी प्रयासों से कराये गये थे। इस बावड़ी की गहराई लगभग एक सौ फीट है, और गांव में 35 इंच वर्षा होने पर यह सौ फीट की बावड़ी पानी से लबालब भरी होती है। आज यह बावड़ी निजी कृषि भूमि के दायरे में है, और इसका उपयोग खेतों की सिंचाई में किया जा रहा है। निश्चित रूप से लदुना के पानी की यह कहानी जहां एक ओर सम्पन्न अतीत से हमारा परिचय कराती है तो वहीं दूसरी और आधुनिक भीषण जल संकट से जूझ रहे समाज के भावों की भी व्याख्या करती है। निष्कर्ष यूं तो स्वयं ही निकालना चाहिए फिर भी लदुना की बावड़ियों को संरक्षित किये जाने की पहल समाज के व्यापक हित में ही होगी।